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मनोवृति को परिभाषित कीजिए तथा मनोवृति एवं अभिक्षमता के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य संबंधों की विवेचना कीजिए । | UPPSC ethics paper 2021 solutions | नीति अखंडता एवं अभिक्षमता UPSC नोट्स

  प्रश्न। 

मनोवृति को परिभाषित कीजिए तथा मनोवृति एवं अभिक्षमता के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य संबंधों की विवेचना कीजिए ।

(UPPSC GS paper 4 2021)

उत्तर। 

किसी भी कार्य के प्रति व्यक्ति की मनःस्थिति को मनोवृत्ति कहते हैं। मनोवृत्ति (Attitude) हमारे मन के संचार को व्यक्त करती है और हमारे व्यवहार को प्रभावित करती है।

मनोवृत्ति की परिभाषा  ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भिन्न है:

मनोवृत्ति की प्राचीन अवधारणा में, किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति उसके कुछ निश्चित मूल्यों या विश्वासों के अनुसार निर्धारित होता है जो उसे सकारात्मक या नकारात्मक व्यवहार या कार्य करने को प्रेरित करता है।

मनोवृत्ति की आधुनिक अवधारणा को अब एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति के रूप में परिभाषित किया गया है। किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति किसी कार्य करने के प्रति पक्ष या विपक्ष के साथ मूल्यांकन करके व्यक्त होता है। आज, पूर्वाग्रह, भेदभाव और सामाजिक असमानता जैसे सामाजिक मुद्दों को जानने के लिए मनोवृत्ति का अध्ययन अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है।

किसी व्यक्ति का दृष्टिकोण सांस्कृतिक मानदंडों, विश्वासों, भावनाओं और व्यक्तिगत अनुभवों के अनुभव जैसे विभिन्न कारकों से प्रभावित होता है।

समस्याओं को हल करने के प्रति सिविल सेवकों का सकारात्मक मनोवृत्ति उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी नैतिक रूप से व्यवहार करने और नैतिक रूप से कार्य करने में मदद करता है।




अभिक्षमता और मनोवृत्ति के बीच संबंध:


किसी व्यक्ति की अभिक्षमता का तात्पर्य किसी विशिष्ट कार्य को सीखने या करने या नैतिक निर्णय लेने की आंतरिक क्षमता से है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति में भारी भार उठाने की क्षमता या मधुर संगीत गायन जैसे कुछ कार्यों के लिए स्वाभाविक योग्यता होती है। 

सिविल सेवकों में अभिक्षमता का अर्थ है निर्णयों में नैतिक मुद्दों की पहचान करने और दूसरों के साथ प्रभावी ढंग से संवाद करने के लिए ज्ञान और कौशल होना की आतंरिक क्षमता होना।


योग्यता और मनोवृत्ति दोनों ही नैतिकता में महत्वपूर्ण और संबंधित अवधारणाएँ हैं, हालाँकि, उनके अलग-अलग भूमिकाएँ हैं। दैनिक जीवन के निर्णयों में नैतिक सिद्धांतों को समझने और लागू करने के लिए सिविल सेवकों (या किसी भी व्यक्ति) में अभिक्षमता होना बहुत जरुरी है , जबकि व्यक्तिगत प्रयासों और नैतिक व्यवहारों के प्रति प्रतिबद्धता को निर्धारित करने के लिए मनोवृत्ति महत्वपूर्ण है।


उच्च अभिक्षमता और नकारात्मक मनोवृत्ति सिविल सेवकों की पूरी क्षमता के उपयोग में बाधा उत्पन्न करता है। उदाहरण के लिए, यदि एक सिविल सेवक आपदा प्रबंधन में अत्यधिक अभिक्षमता (कुशल) है, लेकिन आपदा प्रबंधन में उनकी रुचि नहीं है, तो यह योग्यता (अभिक्षमता) समाज के लिए उपयोगी नहीं है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे तो, भीष्म पितामह के पास राजा होने के सारे अभिक्षमता थी लेकिन उनके राज्य करने के नकारात्मक मनोवृत्ति ( रूचि ) के कारण वहां के जनता हो अच्छी राजा ना मिल सका। 


इसी तरह, सकारात्मक मनोवृत्ति होने के वावजूद यदि सिविल सेवको में अभिक्षमता की कमी हो तो भी वे अच्छे सेवक नहीं बन सकते हैं।  यदि एक सिविल सेवक के पास किसी भी समस्या को हल करने के लिए सकारात्मक मनोवृति है, लेकिन स्थिति का सही ढंग से विश्लेषण करने के लिए व्यापक अभिक्षमता का अभाव है, तो उसे अन्य नकारात्मक लोगों द्वारा आसानी से मुर्ख बना सकता है और सरकारी संसाधनों का प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं हो पायेगा। उदाहरण के लिए , धृतराष्ट्र के पास राज्य चलाने के सकारात्मक मनोवृत्ति थी लेकिन अभिक्षमता की कमी के कारण उसे शकुनि मामा आसानी से सकारात्मक मनोवृत्ति को नकारात्मक मनोवृति में परिवर्तित कर देता था। 


अतः हम कह सकते हैं कि अभिक्षमता और मनोवृत्ति दोनों संबंधित शब्द है परन्तु दोनो में अंतर भी है। सार्वजनिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफल कार्य करने के लिए सिविल सेवकों के पास अभिक्षमता और सकारात्मक मनोवृत्ति दोनों आवश्यक हैं। 

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